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अपने ऊपर लगने वाले आरोपों का अरनब गोस्‍वामी ने यह दिया जवाब...


समाचार4मीडिया ब्‍यूरो
Times Now  के Editorial Director और Editor-in-Chief  अरनब गोस्‍वामी ने अपनी आलोचनाओं का जवाब देते हुए बताया कि क्‍यों किसी भी मुद्दे पर अपना नजरिया रखना महत्‍वपूर्ण है। इसके साथ ही उन्‍होंने यह भी बताया कि क्‍यों वह महत्‍वपूर्ण स्‍टोरी के साथ खेलते (प्‍ले) हैं और समसामयिक मुद्दों पर एक्टिविस्‍ट बने रहना क्‍यों जरूरी है।
Goafest में दूसरे दिन के कार्यक्रम की शुरुआत में अरनब गोस्‍वामी ने कहा, ‘मैं यहां पर अपना बचाव करने अथवा अपना पक्ष रखने नहीं आया हूं कि हम किस प्रकार की पत्रकारिता करते हैं। आज मैं वास्‍तव में इन पर बात करने आया हूं। बहुत सारे लोग बात करते हैं कि हम किस प्रकार की पत्रकारिता करते हैं और मैं इसके खिलाफ अपना बचाव नहीं करता हूं। लोग हमारे बारे में जो कुछ भी कहते हैं, उन सबके लिए मैं आज आपको बताऊंगा कि हम ऐसा क्‍यों करते हैं।’  
उन्‍होंने कहा, ‘आज मैं आपको यह बताने आया हूं कि हम क्‍या करते हैं और क्‍यों करते हैं। मैं जिस तरह की पत्रकारिता करता हूं, वह क्‍यों करता हूं। मैं क्‍यों इसके बारे में सोचूं कि मैं जिस तरह की पत्रकारिता करता हूं, कुछ लोग उसका विरोध करते हैं।  मैं यह नहीं कहता कि हमारी पत्रकारिता उनसे अलग तरह की है, हम नए तरह के पत्रकार हैं। पत्रकारिता प्रासंगिक है और अप्रासंगिक भी है। यह पत्रकारिता लोगों से संबंधित है और लोग इसे देखना पसंद करते हैं।’ इसके बाद अरनब गोस्‍वामी ने उन बातों की ओर ध्‍यान दिलाया जिन्‍हें पत्रकारिता का आधार स्‍तंभ कहा जाता है और क्‍यों वह मानते हैं कि आज वह अपनी पकड़ नहीं बना पा रही हैं।
विचारों की पत्रकारिता करता हूं
पहले कहा जाता था कि कभी अपनी राय व्‍य‍क्‍त मत करो क्‍योंकि वह गलत पत्रकारिता कहलाती थी। लेकिन मैं जिस तरह की पत्रकारिता करता हूं वह अपने विचारों (opinion) की पत्रकारिता है। अपना एक मत मनाओ और उसे राजनीतिक रूप से हावी नहीं होने दो और न ही उसका बचाव करो। पत्रकारिता वह नहीं होती है जो झूठी धारणा में विश्‍वास रखती है और जो पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों का उल्‍लंघन करती है।
अरनब गोस्‍वामी ने कहा कि जब किसी भी पत्रकार का सही और गलत से सामना होता है, ‘तो क्‍या आप पीछे बैठना पसंद करोगे।’ उन्‍होंने कहा कि अच्‍छे  पत्रकार का मतलब है कि वह तटस्‍थ रहे लेकिन यह बताने की स्थिति में हो कि क्‍या सही और क्‍या गलत है। उन्‍होंने कहा कि जब कुछ गलत होता है तो यही निष्‍पक्षता अपनी जगह अडिग खड़ी रहती है। यदि कोई पत्रकार हिंसा अथवा भ्रष्‍टाचार के मामले में तटस्‍थ होकर अपना काम करता है तो वह पत्रकारिता बेकार की कवायद बन जाती है जिसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता और जो लोगों तक अपनी पहुंच नहीं बना पाती है।
स्‍टोरी पर काम करता हूं
स्‍टोरी पर काम करो और एक तरह से उसके साथ खेलते रहो। Times Now के लिए स्‍टोरी को सनसनीखेज बनाने की बात कही जाती है लेकिन यदि स्‍टोरी को सनसनीखेज नहीं बनाया जाता तो वर्ष 2006 में प्रिंस नामक जो बच्‍चा बोरवेल में गिर गया था, उसे बचाया नहीं जा सकता था। गोस्‍वामी ने कहा, ‘प्रिंस की स्‍टोरी सरकार की आंख खोलने वाली थी। सारी दुनिया ने इस स्‍टोरी को देखा क्‍योंकि हमने इसे सनसनीखेज बनाया। यदि यह पत्रकारिता नहीं है तो मैं उस पत्रकारिता को चुनौती देता हूं जिसके बारे में कहा जाता है कि यह असहायों और मजलूमों की आवाज है। और मैं उन पत्रकारों को भी चुनौती देता हूं जो इस तरह की पत्रकारिता पर सवाल उठाते हैं। इस तरह की पत्रकारिता का ही प्रभाव है कि अब उस तरह की घटनाएं नहीं हो रही हैं। अधिकारी वर्ग मीडिया से डरा हुआ है और अपना काम कर रहा है, जो उसे करना चाहिए।
एक्टिविस्‍ट बनने का प्रयास करता हूं
अपने ऊपर लगाए गए एक्टिविस्‍ट होने के आरोपों का जवाब देते हुए गोस्‍वामी ने कहा कि जर्नलिज्‍म और एक्टिविज्‍म के बीच की रेखा क्‍यों मिट गई है। उनका मानना है कि किसी मुद्दे को उठाकर उस पर लगातार मीडिया कवरेज देने से पीडि़त को न्‍याय मिलने में मदद मिलती है।
स्‍टोरी में ज्‍यादा इनवॉल्‍व हो जाता हूं
इस आरोप पर कि वो स्‍टोरी में कुछ ज्‍यादा ही इनवॉल्‍व हो जाते हैं, गोस्‍वामी ने कहा कि चैनल ने विभिन्‍न घोटालों की स्‍टोरी ब्रेक की थी। जैसे राष्‍ट्रमंडल खेल घोटाला, देवास का इसरो घोटाला, 2जी घोटाला, आदर्श कारगिल घोटाला। यह इसलिए हो सका कि चैनल इन स्‍टोरी की तह तक में गया था। भारतीय पत्रकारिता में घोटालों के खुलासों के लिहाज से वर्ष 2011-12 एक चमत्‍कारिक दौर (magical moment) था। गोस्‍वामी ने कहा कि इस तरह की पत्रकारिता दोबारा कभी नहीं होगी जिसने पत्रकारिता के इस नए रूप को जन्‍म दिया।
दूसरों को भी पूरा मौका देता हूं
हाल में राहुल गांधी के साक्षात्‍कार का हवाला देते हुए गोस्‍वामी ने कहा कि उन्‍होंने राहुल को बोलने का पूरा मौका दिया। इसके साथ ही उन्‍होंने कहा कि भारतीय मीडिया के लिए यह इंटरव्‍यू इसलिए काफी महत्‍वपूर्ण था कि इससे यह पता चला कि गांधी शीर्ष नेतृत्‍व के लिए तैयार नहीं थे और आम चुनावों के बारे में उनकी राय भी पता चली।
जब बदली न्यूज कवरेज की सोच
उस घटना को याद दिलाते हुए गोस्‍वामी ने बताया कि कैसे उन्‍हें महसूस हुआ कि जिस तरह की पत्रकारिता वे कर रहे हैं, वह गलत थी और सोसायटी में मीडिया की भूमिका को उन्‍होंने दोबारा से जांचा। उन्‍होंने बताया कि जब अभिनेता संजय दत्‍त को मुंबई की जेल से ट्रांसफर किया जा रहा था तो मीडिया के कुछ लोगों ने संजय दत्‍त का पुणे तक पीछा किया और सभी चैनलों ने इसे लगातार दिखाया। उसी दोपहर को गोस्‍वामी को बेंगलुरु से एक फोन आया। फोन करने वाले ने बताया कि उसका सैन्‍य अफसर दोस्‍त कर्नल वसंत वेणुगोपाल सीमा पर आतंकियों से मुकाबला करते हुए शहीद हो गया। उस व्‍यक्ति ने बताया कि दूरदर्शन को छोड़़कर किसी भी चैनल ने उनके अंतिम संस्‍कार को कवर नहीं किया। इस घटना ने गोस्‍वामी की पत्रकारीय सोच को बदल दिया। गोस्‍वामी ने कहा, ‘इसके बाद मेरे पास कहने के लिए कुछ नहीं था। यहां मैं संजय दत्‍त को कवर कर रहा था और य‍ह बुनियादी सत्‍य मेरे सामने आया जिसने मेरी सोच को बहुत प्रभावित किया।’

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